IPC 498A in Hindi – आईपीसी धारा 498A क्या है पूरी जानकारी

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आज हम आपको बताने जा रहे है की आइपीसी धारा 498A क्या है (IPC 498A in Hindi) , इसके बारे में जानना हमारे लिए बहुत जरूरी है तो हम आपको बताएंगे कि आइपीसी की धारा 498A क्या कहती है (what does IPC 498A says in Hindi) और इस धारा में कैसे सजा और जमानत होती है (Punishment and Bail IPC 307 in Hindi) इसके बारे में ओर भी बहुत कुछ बताएंगे।

भारत अपना देश , जिसके इतिहास को देखोगे तो आपको दिखेगा की महिलाओ का योगदान हमेशा से ही बना रहा है अपने देश के निर्माण में। चाहे महाराजाओ का समय हो , ब्रिटिश राज काल या फिर आज के कलयुग में महिलाओ का योगदान आपको मिल ही जायेगा। और महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने के लिए बोहोत से कानून बनाये गए है अपने देश में। 

IPC 498A in Hindi

हमारे देश का जो सम्भिदान है उस में पुरुष और महिलाओ को सामान दर्जा देने के लिए हर वो कानून लाये गए है जिस से महिला ओर सुरक्षित महसूस करे अपने समाझ में। वैसा ही एक कानून है धारा 498-ए जो की महिलाओ की शुरक्षा के लिए बनाया गया था। IPC Section 498-ए एक ऐसा हथियार है महिलाओ के लिए जो हम समझते है की हर महिला को इसके बारे में ज्ञान होनी चाहिए। 

IPC 498A in Hindi – आईपीसी धारा 498A क्या है पूरी जानकारी

जब एक महिला शादी के बाद एक नए परिवार में जाती है तो ऐसा पाया गया है की उसके साथ दुर बेहवार होता है और हिंसा होता है और इसका एक प्रमुख कारन है दहेज़। कई बार ऐसे मामले सामने आये है जिनमें हिंसा के वजह से जान भी खोना पड़ा है।  इस के चलते बोहोत से आंदोलन हुवे महिलाओ के बचाओ के लिए। 

उनको अपने ससुराल में दूर बेवहार से बचने के लिए। इसी के चलते महिला आंदोलन के दबाव में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में ‘498-ए’ वजूद में आया। धारा 498-ए यानी किसी महिला पर पति या पति के रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता करने की हालत में बचाने वाला कानून। यह कानून क्रूरता की परिभाषा भी बताता है। 

सेक्शन 498A IPC (Indian Penal Code) अगर पति या फिर कोई पति के रिश्तेदार महिला (बहु) के ऊपर किसी भी तरह के दुष्कर्म /हिंसा किआ जाए – दुष्कर्म करने वाला अथवा हिंसा करने वाले को 3 साल तक की जेल और जुरमाना देना होगा।

  • कोई भी ऐसा काम जिससे महिला को आत्म हत्या के लिए उकसाया जाए , उसे किसी भी तरीके की शारीरिक हानि पोहोचे या फिर उसके ज़िन्दगी को खतरा हो।
  • महिला के ऊपर दबाव बनाया जाए किसी भी तरीके की संपत्ति मांगने के लिए अथवा किसी को देने के लिए।
  • इसे गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा गया है। साथ ही यह गैर जमानती अपराध है।
  • दहेज के लिए ससुराल में प्रताड़ित करने वाले तमाम लोगों को आरोपी बनाया जा सकता है।

धारा 498-A क्या है कानून में प्रावधान (Section 498-A Provision in Law in Hindi)

इस मामले में दोषी पाए जाने पर अधिकतम 3 साल तक कैद की सजा का प्रावधान है। वहीं अगर शादीशुदा महिला की मौत संदिग्ध परिस्थिति में होती है और यह मौत शादी के 7 साल के दौरान हुआ हो तो पुलिस आईपीसी की धारा 304-बी के तहत केस दर्ज करती है।

1961 में बिना दहेज निरोधक कानून रिफॉर्मेटिव कानून है। दहेज निरोधक कानून की धारा 8 कहता है कि दहेज देना और लेना संज्ञेय अपराध है। दहेज देने के मामले में धारा-3 के तहत मामला दर्ज हो सकता है और इस धारा के तहत जुर्म साबित होने पर कम से कम 5 साल कैद की सजा का प्रावधान है।

IPC Section 4 के मुताबिक, दहेज की मांग करना जुर्म है। शादी से पहले अगर लड़का पक्ष दहेज की मांग करता है, तब भी इस धारा के तहत केस दर्ज हो सकता है।

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धारा 498-A​ के तहत शिकायत कैसे दर्ज़ की जाती है

(भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता) 1973 की धारा 468, में बताया गया है कि IPC 1860 की धारा 498-A, में वर्णित अपराध का आरोप लगाते हुए अगर कोई शिकायत की जाती है तो यह  घटना के 3 साल के अंदर पुलिस थाने में दर्ज करवाई जा सकती है।

साथ ही किसी स्त्री के पति या पति के नातेदार द्वारा उसके प्रति क्रूरता करने पर भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 473 में बताया गया है कि न्यायालय को ऐसे किसी अपराध में शिकायत के दर्ज होने की समय सीमा समाप्त होने के बाद भी विचार करने का अधिकार होता है, यदि न्यायालय इस बात से संतुस्ट है, कि न्याय के हित में ऐसा करना आवश्यक है।

आईपीसी (IPC) की धारा 498A में  जमानत  (BAIL) का प्रावधान

इस धारा के अंतर्गत अर्थात 498A में सर्वोच्च न्यायालय ने दहेज उत्पीड़न मामले में और किसी स्त्री के पति या पति के नातेदार द्वारा उसके प्रति क्रूरता करने पर पुरुष पक्ष के लिए अग्रिम जमानत का प्रावधान किया है, परन्तु गिरफ्तारी पर रोक नहीं लगायी है, इसका  सीधा सा अर्थ है कि यहाँ महिला की सुरक्षा को ध्यान में रखा गया है.

साथ ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा भारत सरकार को धारा 498A की कमियों को दूर करने के लिए  निर्देश भी दिया गया है आपको बताते चलें कि अग्रिम जमानत के लिए  न्यायाधीश से अनुमति प्राप्त करनी होगी यदि पहले का किसी भी प्रकार का क्रिमिनल रिकार्ड नहीं होगा तो न्यायाधीश अपने विवेक के आधार पर अग्रिम जमानत दे सकते है|

यहाँ एक बात और जानने योग्य है कि यदि आरोपी को पूर्व  में किसी भी ऐसे जुर्म के लिए दोषी ठहराया जा चुका हो, जिसकी सज़ा 7 साल से अधिक हो तब न्यायालय द्वारा उसे अग्रिम ज़मानत नहीं दी जाएगी 

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धारा 498-A में वकील की जरुरत क्यों होती है?

IPC Section 498A का अपराध एक संज्ञेय अपराध है, जिसमें कारावास की सजा का प्रावधान भी दिया गया है, जिसकी समय सीमा को 3 बर्ष तक बढ़ाया जा सकता है। इस अपराध में कारावास के दंड के साथ – साथ आर्थिक दंड का भी प्रावधान दिया गया है। ऐसे अपराध से किसी भी आरोपी का बच निकलना बहुत ही मुश्किल हो जाता है.

इसमें आरोपी को निर्दोष साबित कर पाना बहुत ही कठिन हो जाता है। ऐसी विकट परिस्तिथि से निपटने के लिए केवल एक अपराधिक वकील ही ऐसा व्यक्ति हो सकता है, जो किसी भी आरोपी को बचाने के लिए उचित रूप से लाभकारी सिद्ध हो सकता है, और अगर वह वकील अपने क्षेत्र में निपुण वकील है,

तो वह आरोपी को उसके आरोप से मुक्त भी करा सकता है। और हत्या जैसे बड़े मामलों में ऐसे किसी वकील को नियुक्त करना चाहिए जो कि ऐसे मामलों में पहले से ही पारंगत हो, और धारा 498, ‘ए’ जैसे मामलों को उचित तरीके से सुलझा सकता हो। जिससे आपके केस को जीतने के अवसर और भी बढ़ सकते हैं।

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हमने इस आर्टिक्ल में आपको सारी जानकारी देने की कोशिश की है जो एक नागरिक को जानने की आवशकता होती है।हम समझते है समझ में सुधर लाने के लिए हर नागरिक को जागरूक बनना पड़ेगा तभी बदलाव संभव है।

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अगर आपको कोई भी बात इस आर्टिकल में समझ आई हो या फिर आप को कुछ ठीक ना लगा हो तो जरूर कमेंट करके हमें बताए।  

धन्यवाद्

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