आईपीसी धारा 83 क्या है – IPC section 83 in Hindi – पूरी जानकारी

आज इस आर्टिकल में हम आपको बताएंगे कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 83 क्या है (What is IPC section 83 in Hindi), आईपीसी धारा 83 में कैसे अपराध होता है, कितनी सजा सुनाई जाती है, (Punishment and Bail in IPC Section 83) जमानत होती है या नहीं, अगर जमानत होती है तो कैसे होती है, वकील की ज़रूरत कब लगती है, इस अपराध को करने से कैसे बचा जा सकता है। यह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 83 क्या कहती है (What does IPC section 83 says in Hindi), सब कुछ विस्तार से समझाने कि कोशिश करेंगे।

अक्सर देखते है कि छोटे बच्चे खेलते खेलते कुछ गलत काम कर देते हैं जिनके बारे में उन्हें ज्ञान नहीं होता है, उन्हें मालूम नहीं होता है जो वो कर रहें हैं वो अपराध भी हो सकता है, उन्हें अपराध का अर्थ ही मालूम नहीं होता है। बस वो कर देते है मजे मजे में और वो कार्य अपराध बन जाता है। अगर बच्चा 15 साल से ज्यादा का हो तो उसे समझ होती है कि कौनसा काम गलत है और कौनसा सही है। मगर यदि बच्चा उससे कम उम्र की हो तो उसे सही गलत का ज्ञान नहीं होता है।

तो आज हम ऐसे ही एक धारा के बारे में जानेंगे और देखेंगे कि सात वर्ष से ऊपर किंतु बारह वर्ष से कम आयु के अपरिपक्व समझ के शिशु का कोई कार्य जो अपराध हो तब क्या होता है। यह सभी हम भारतीय दण्ड संहिता की धारा 83 (IPC section 83 in Hindi) में विस्तार से समझाने की कोशिश करेंगे तो आपको यह आर्टिकल अन्त तक पढ़ना है।

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आईपीसी धारा 83 क्या है (What is IPC Section 83 in Hindi)

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 83 के अनुसार ऐसा कोई कार्य अपराध नहीं है, जो सात वर्ष से ज्यादा और बारह वर्ष से कम आयु के ऐसे शिशु द्वारा की जाती है। जिसकी समझ इतनी परिपक्व नहीं हुई है कि वह उस अवसर पर अपने आचरण की प्रकॄति और परिणामों का निर्णय कर सके ।

आसान भाषा में समझाने की कोशिश करें तो ऐसा कोई कार्य अपराध नहीं है जो 7 से 12 वर्ष के बच्चे द्वारा किया जाता हो। उस बच्चे का मानसिक स्तर उस कार्य को करते वक्त इतना था की वह अपने द्वारा किये गए कृत्य की प्रकृति को समझ सके और उसके परिणामों के सम्बन्ध में निर्णय लेने की क्षमता रख सके। इस धारा में बच्चे द्वारा किये गए कार्य की प्रकृति समझने और उसके परिणाम के सम्बन्ध में निर्णय ले सकने की क्षमता को देखा जाता है।

इसमें यह साबित करना होता है कि अपराध करते वक़्त न केवल वह शिशु 12 वर्ष से कम आयु का था बल्कि वह अपने द्वारा किये गए कार्य की प्रकृति समझने और उसके परिणाम के सम्बन्ध में निर्णय ले सकने की क्षमता नहीं रखता था। इसके अभाव में अदालत यह समझेगी कि वह शिशु परिपक्व था कि वह किसी गलती और अपराध में भेद कर सके।

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इस आर्टिकल में हमने आपको बताया कि सात वर्ष से ऊपर किंतु बारह वर्ष से कम आयु के अपरिपक्व समझ के शिशु का कोई कार्य जो अपराध हो तब क्या होता है।  इस धारा से संबंधित सारी जानकारी हमने आपको भारतीय दण्ड संहिता की धारा 83 (IPC section 83 in Hindi) में बहुत ही विस्तार और आसान भाषा में समझाने की कोशिश की है।

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