IPC Section 98 in Hindi – आईपीसी धारा 98 क्या है पूरी जानकारी

आज इस आर्टिकल में हम आपको बताएंगे कि भारतीय दंड संहिता की धारा 98 क्या है (What is IPC section 98 in Hindi), कैसे इसमें अपराध होता है, कितनी सजा सुनाई जाती है, जमानत होती है या नहीं, कैसे इस अपराध को करने से बचा जा सकता है। भारतीय दंड संहिता की धारा 98 क्या कहती है (What does IPC section 98 says in Hindi), सब कुछ विस्तार से जानेंगे।

यदि कोई छोटा बच्चा कुछ गलत काम कर देता है तो उसपर कोई केस दर्ज नहीं किया जाता क्योंकि वह नासमझ होता है, उसका ऐसा कुछ गलत करना मकसद नहीं होता है, वो अनजाने में ऐसा कर देता है। ऐसे ही यदि कोई बड़ा व्यक्ति जो मानसिक रूप से ठीक नहीं हो, जो बड़ा होकर भी बच्चों की तरह हरकतें करता हो, जिसमें नासमझ हो वो भी यदि ऐसा कर देता है तो उसपर भी कोई केस दर्ज नहीं किया जाता है।

IPC Section 98 in Hindi

उसकी नासमझी समझ कर उसे माफ़ कर दिया जाता है मगर यदि उसका मकसद हो ऐसा करने का तब उस पर प्रावधान लगा कर उसे दंडित किया जाता है। तो आज हम ऐसे ही एक धारा के बारे में जानेंगे और देखेंगे की ऐसे व्यक्ति के कार्य के ख़िलाफ़ प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार जो विकृतचित्त (Unsound mind) आदि हो। यह सभी बातें हम भारतीय दंड संहिता की धारा 98 में जानेंगे तो आपको यह आर्टिकल अन्त तक पढ़ना है।

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आईपीसी धारा 98 क्या है (What is IPC Section 98 in Hindi)

भारतीय दंड संहिता की धारा 98 के अनुसार जब भी कोई कार्य जो कोई अपराध होता, उस कार्य को करने वाले व्यक्ति के बालकपन, समझ की कमी के अभाव, मानसिक अभाव या मत्तता (Drunkenness) के कारण, या उस व्यक्ति के किसी भ्रम के कारण वह अपराध नहीं है, तब हर व्यक्ति उस कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का वही अधिकार रखता है, जो वह उस कार्य के वैसा अपराध होने की दशा में रखता।

यानी कि यदि कोई व्यक्ति जो मानसिक रूप से ठीक नहीं, बालकपन में या शराब के नशे में कोई अपराध करता है, उसका मकसद नहीं हो अपराध करना पर हो जाता है तो ऐसे व्यक्ति के हर कार्य के ख़िलाफ़ प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार है।

स्पष्टीकरण (The Explanation)

  • पागलपन के असर में, को जान से मारने का प्रयत्न करता है किसी अपराध का दोषी नहीं है। किन्तु को प्राइवेट प्रतिरक्षा का वही अधिकार है, जो वह के पागलपन होने की दशा में रखता। 
  • रात्रि में एक ऐसी जगह प्रवेश करता है जिसमें प्रवेश करने के लिए वह वैध रूप से हकदार है। य, सद्भावपूर्वक को गॄह-भेदक समझकर, पर हमला करता है। यहां य इस भ्रम के अधीन क पर आक्रमण करके कोई अपराध नहीं करता किंतु , य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का वही अधिकार रखता है, जो वह तब रखता, जब य उस भ्रम के अधीन कार्य न करता।

 Example:  राजू एक रात घर में अकेला होता है और रात को जब वह सो जाता है तब उसके घर में कोई दरवाजा खोलने की आवाज आती है तो उसे लगता है कि कोई चोर घुस गया है तो वह लकड़ी लेकर दरवाजे के वहाँ जाता है और हमला करने की कोशिश करता है।

मगर जैसे ही दरवाजा खुलता है और वह उस आदमी को मार देता है मगर बाद में सामने पाता है कि वह आदमी उसका भाई है, उसके भाई पर आक्रमण करना उसका मकसद नहीं था, उसे लगा कोई चोर घुस गया है इस वजह से हमला किया तो यह अपराध नहीं माना जायेगा।

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इस आर्टिकल में हमने आपको बताया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 98 क्या है (IPC section 98 in Hindi), कैसे इसमें अपराध होता है, यह धारा क्या कहती है, सब कुछ बहुत ही विस्तार और आसान भाषा में समझाने की कोशिश की है।

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