Section CRPC 202 in Hindi – सीआरपीसी की धारा 202 क्या है पुरी जानकारी

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दोस्तों आज की इस आर्टिकल में हम आपको बताएंगे कि सीआरपीसी धारा 202 क्या होती है (What is section Crpc 202 in Hindi), इस धारा में क्या बताया गया है। कैसे सीआरपीसी की धारा 202 लागू होती है। सीआरपीसी की धारा 202 क्या कहती है (What does section Crpc 202 says in Hindi), सब कुछ विस्तार से जानेंगे इसलिए आप ये आर्टिकल लास्ट तक पढ़ते रहना।

दोस्तों हमने अभी तक जाना और समझा है के हमारे भारत देश के न्याय व्यवस्था में कौन-कौन से  नियम कानून है तथा कौन-कौन सी धाराएं है। इन सभी धाराओं में अलग अलग तरह के दंड निर्धारित है, जिसमे जुर्म या अपराध करने वाले अपराधियों को उनके दोष सिद्ध हो जाने पर उनमें लगने वाले धाराओं के आधार पर उचित दंड से दण्डित किया जाता है। लेकिन क्या कभी आपने ये सोंचा है के पर्याप्त सबूत ना होने पर क्या होता होगा?

जब भी कभी हम न्यूज़ पेपर या न्यूज़ चैनल देखते है जो किसी क़ानूनी कार्यवाही के बारे में बता रहे होते है, तो अक्सर हमे ये देखने या सुनने को मिलता है कि इस केस कि तिथि (Date) आगे बढ़ा दी गयी है या इसकी क़ानूनी कार्यवाही के लिए और पुख्ता या ठोस सबूतों कि मांग है।  तो दोस्तों कार्यवाही को आगे ना बढ़ा पाना, ये इसलिए होता है कि उस केस से सम्बंधित जो सबूत है वो पर्याप्त नहीं होते है।

Section CRPC 202 in Hindi

जिस कारणवश न्यायधीश और पुख्ता सबूतों और गवाहों कि मांग करता है, ताकि आगे कि कार्यवाही करी जा सके। आज हम ऐसी ही एक धारा के बारे में जानेंगे जो हमे ये बताएगी कि ऐसी किसी स्थिति में क्या किया जाता है। दोस्तों Section Crpc 133 in Hindi आर्टिकल को आप आगे तक पढ़िए जिससे आपको अच्छे से समझ आ जाये।

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सीआरपीसी धारा 202 क्या होती है (What is Section CRPC 202 in Hindi)

क्या है भारतीय दंड संहिता की धारा 202 भारतीय दंड संहिता CRPC की धारा 202 के तहत, पूछताछ के चरण मे न्यायधीश केवल शिकायत में लगाए गए आरोपों और शिकायत में दिए गए सबूतों के समर्थन में दिए गए सबूतों को देखता है।भारीतय दंड संहिता की धारा 202 के आदेशिका के जारी किए जाने को मुल्तवी करना है।“

चलिए अब इसे आसान तरीके से समझते है ताकि हमे अच्छे से ये समझ में आये और हम किसी और को भी आसानी से और अच्छी तरह से समझा सके।

भारतीय दंड संहिता की धारा 202- दोस्तों, जब CRPC की धारा 202 लगती है तब इस स्थिति में जज (Magistrate / judge) का ये कार्य या काम रहता है कि, जिस दोषी पर जिन कारणों से आरोप लगे हुए है उसके बारे में जानना और साथ ही साथ उस आरोप के सबूत क्या है? ये जानना। जज का काम ये भी रहेगा,

इस धारा के चलते जांच का उद्देश्य ये पता लगाना है कि प्रथम दृष्टया केस बनता है या नहीं और क्या अभियुक्त के खिलाफ कार्यवाही के लिए पर्याप्त आधार है या नहीं। मान लीजिये किसी ने किसी के खिलाफ शिकायत की तब उस स्थिति में सबूत लाने होते है उस अपराध को सिद्ध कर सके।

तो इस धारा के तहत जांच का जो दायरा रहेगा वो शिकायत में लगाए गए आरोपों तक सीमित है ताकि यह पता चल सके कि CRPC की धारा 204 के तहत कार्यवाही शुरू की जानी चाहिए या नहीं। और अगर नहीं तो फिर  CRPC की धारा 203 का सहारा लेते हुए शिकायत को यह कह कर खारिज कर दिया जाता है, कि शिकायतकर्ता के बयान और गवाहों के बयान, के आधार पर कार्यवाही शुरू करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है।

CRPC की Section 202 के तहत पूछताछ के श्रेणी में, मजिस्ट्रेट केवल शिकायत में लगाए गए आरोपों या शिकायत में दिए गए सबूतों के समर्थन में दिए गए सबूतों को देख कर विचार करता है।  ताकि मजिस्ट्रेट खुद को संतुष्ट कर सके ताकि उसके पास दोषी के खिलाफ कार्यवाही शुरू करने के लिए पर्याप्त आधार है।

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भारतीय दंड संहिता की धारा CRPC 202 के तहत

आदेशिका के जारी किये जाने को मुल्तवी (Postpone) करना,

 1  यदि कोई मजिस्ट्रेट ऐसे अपराध का परिवाद प्राप्त करने पर, जिसका संज्ञान (जानना या समझना) करने के लिए वह् प्राधिकृत है या जो धारा 192 के अधीन उसके हवाले किया गया है. तो ऐसे मामले में जहां अभियुक्त ऐसे किसी स्थान में निवास कर रहा है जो उस क्षेत्र से परे है जिसमें वह अपनी अधिकारिता का प्रयोग करता है।

अभियुक्त के विरुद्ध आदेशिका का जारी किया जाना मुल्तवी कर सकता है और यह विनिश्चित करने के प्रयोजन से कि कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार है अथवा नहीं, या तो स्वयं ही मामले की जांच कर सकता है या किसी पुलिस अधिकारी द्वारा या अन्य ऐसे व्यक्ति द्वारा, जिसको वह ठीक समझे अन्वेषण किए जाने के लिए निदेश दे सकता है : परंतु अन्वेषण के लिए ऐसा कोई निर्देश वहां नहीं दिया जाएगा।

(क) जहाँ मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है यानी की लगता है कि वह अपराध जिसका परिवाद किया गया है अनन्यतः सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय है। 

() जहां परिवाद किसी न्यायालय द्वारा नहीं किया गया है जब तक कि परिवादी की या मौजूद साक्ष की, CRPC Secion 200 के अधीन शपथ पर परीक्षा नहीं कर ली जाती है।

 2  उपधारा (1) के अधीन किसी जांच में यदि मजिस्ट्रेट ठीक समझता है तो साक्षियों का शपथ पर साक्ष्य ले सकता है : परंतु यदि मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है यानी की लगता है कि वह अपराध जिसका परिवाद किया गया है अनन्यतः सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय है तो यह परिवादी से अपने सब साक्षियों को पेश करने की अपेक्षा करेगा और उनकी शपथ पर परीक्षा करेगा।

 3  यदि उपधारा (1) के अधीन अन्वेषण किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा किया जाता है जो Police Officer नहीं है तो उस अन्वेषण के लिए उसे वारंट के बिना गिरफ्तार करने की शक्ति के सिवाय पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी (Charge officer) को इस संहिता द्वारा प्रदत्त सभी शक्तियां होंगी।

 Note Point:   दोस्तों इसमें जज का कार्य ये है के पहले वो हर एक सबूतों को अच्छे से जांच करे ताकि कार्यवाही शुरू करी जा सके। यदि कोई व्यक्ति बाहर का है तो ये मजिस्ट्रेट की ही जिम्मेदारी बनती है की वो शिकायत, सबूतों और गवाहों के बारे में समन भेजने से पहले अच्छी तरह से पता करे या पुलिस द्वारा इसकी जांच करवाए ताकि आगे की कार्यवाही की प्रकिया शुरू की जा सके।

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आशा है की आपको CRPC की धारा 202 क्या है? इससे सम्बंधित बहुत सी जानकारी आपको हुई होगी और साथ ही CRPC की धारा 202 क्या कहती है? (What does section Crpc 202 says in Hindi) इसकी जानकारी भी आपको मिल गई होगी। तो अगर आपको ये आर्टिकल पसंद आया हो तो आप अपने दोस्तों के साथ जरूर इसे शेयर करें ताकि आपके दोस्त भी हमारे भारतीय दंड संहिता के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकें।

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